रामनाथ शिवेन्द्र केआदिवासी केन्द्रित प्रमुख उपन्यास

 


रामनाथ शिवेन्द्र के

आदिवासी केन्द्रित प्रमुख उपन्यास   

    

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सीमांत की संघर्ष-गाथाहरियल की लकड़ी

                                                 अरविन्द चतुर्वेद

दुनिया के जिससबसे बड़े लोकतंत्रामें हम रहते हैं, आज़ादी के अठ्ठावन साल बाद आज भी सीमांत पर कई ऐसी जिन्दगियां हैं जिन्हें आज़ादी की रोशनी मयस्सर नहीं, उलटे तंत्रा के शिकंजे में वे छटपटा रही हैं। विकास की संजीवनी तो खैर उन्हें क्या मिले, विडंबना ही है कि विकास की मार ने उनका जीना दूभर कर रखा है। ये सीमांत के दूर-दराज के जंगली गॉव भी हो सकते हैं और शहरों की झुग्गी-झोपड़ियां या फुटपाथी जिन्दगी भी।

कथाकार रामनाथ शिवेन्द्र के हाल ही में आये उपन्यासहरियल की लकड़ीमें जिस तरह से सीमांत की जीवन गाथा उपस्थित हुई है वह भौगोलिक रूप से भी उत्तर-प्रदेश का दक्षिणी-पूर्वी सीमांत है। सोनभद्र जनपद के रूप में वही सीमांत है जो कोयला, सीमेन्ट, अल्युमिनियम की बदौलत औद्योगिक अंचल और बिजली कारखानों के चलते ऊर्जा राजधानी जैसे चमकदार जुमले से संबोधित किया जाता है तो दूसरी ओर इसी सीमांत पर विकास की मारी, विस्थापन से धकियाई हुई वह ग्रामीण जंगली बस्तियां हैं जो अपने -विकास में अचल हैं और प्रशासनिक अंधेरगर्दी, लूट,खसोट तथा बहुस्तरीय दैहिक-मानसिक शोषण की स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं। छब्बीस उपशीर्षकों में विन्यस्त उपन्यासहरियल की लकड़ीमें इसी ग्रामीण आदिवासी ज़िन्दगी की संघर्ष गाथा को उसकी अनेक गूंज-अनुगूंज के साथ प्रस्तुत किया गया है। कहना होगा कि बहुत हद तक इसमें उपन्यासकार को सफलता मिली है। वैश्वीकरण के जिस अभियान में विकास की दंुदुभी बजाई जा रही है उसकी असलियत जाननी हो तो सीमांत के परिवेश का जायजा लेने से उसका खोखलापन अपने आप उजागर हो जाता है। इस उपन्यास में आये गॉव का जीवन परिवेश देखिए....कृ

सदी का गुज़रना इस गॉव से गायब था। यहां परंपरायें थीं, उनका दबाव था। दूसरी कोई चीज थी तो वह था जंगल, नदी नाले पहाड़। जंगल में महुआ, करवन, बेर, हर्रा, बहेरा जैसे कुछ जंगली फल-फूल थे। जिन्हें अपने उपयोग के लिए प्रयोग में लाना कानून प्रतिबंधित और दण्डित करता था। गॉव हजारों साल की परंपराओं में वह गॉव कुछ इस तरह ढंका था कि नई सदी का वहां कहीं अता-पता चलता था। एक तरफ धॉगरी बोलते हुए करम देवता खड़े थे तो दूसरी ओर मैदानी इलाके में राम, कृष्ण, शंकर जैसे देवता भी पुजहाई करवाने में कम थे। हाल के सालों में कुछ नेताओं, परेताओं के नाम भी गॉव में घुस चुके हैं। (पृ.68)

उपन्यास की मुख्य कथा तो बस इतनी ही है कि चेरो जाति की आदिवासी युवती बसमतिया का पति जगदा पॉच साल पहले गॉव छोड़कर कहीं चला गया है। वह लौटा, उसने इस बीच अपनी कोई खबर दी। लेकिन बसमतिया है कि अपनी बूढ़ी विधवा सास के साथ रह कर मेहनत मजूरी करते हुए ज़िन्दगी बसर किये जा रही है। वह जवान है, आकर्षक है, मेहनती है, और चाहे तो अपने जाति समाज के मुताबिक किसी दूसरे युवक के साथसलटकर ज़िन्दगी की नई पारी भी शुरू कर सकती है। लेकिन वह जगदा के लौटने का इन्तजार करती है। जगदा वापस जाये इसके लिएछठका ब्रत रखती है, ‘करमदेवता से मनौती करती है। वह जगदा और उसकी स्मृतियों कोहारिल की लकड़ीकी तरह थामेे हुई है, जकड़े हुई है।

सीमांत की ज़िन्दगी का अर्थिक संघर्ष कितना गहरा है उपन्यास में आया विवरण द्रष्टव्य है---

चेरवान के परिवारों की संख्या चालीस थी तथा धॉगर कुल पैंतालिस परिवार थे, अहीर जो लगभग भूमिहीन थे उनकी संख्या चार परिवार की थी। भूमिहीन गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले इन परिवारों के बच्चे स्कूल जाते थे। बहुतायत लोगों के पास बंधी में ली गई जमीनों के एवज में चौदह-चौदह बिस्वों के दिए गये छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े थे। गॉव के भूमिहीन जंगल विभाग के कामों पर सब्बल, गैंता, फावड़ा चलाते और औरतें टोकरियॉ ढोतीं। कभी जंगल में उन्हें वृक्षारोपण का काम भी मिल जाता।

लेकिन जिस बसमतिया की जिन्दगी दागों वाली दुनिया की थी, वह जल की तरह चमकदार थी और पारदर्शी भी।पृ..54

उसकी स्थिति दूसरों से इस मायने में भिन्न है कि आर्थिक अभाव के साथ ही उसका जीवन भवनात्मक अभाव से भी ग्रसित है। इसलिए यह बहुत ही स्वाभाविक है कि...

बसमतिया वर्तमान में जीने वाली औरत थी। उसके पास तो अतीत की आनददायक स्मृतियॉ थीं और ही भविष्य का मनोरम सपना थापृ.127

तो क्या बसमतिया के अन्दर इच्छा-आकांक्षा थी, राग-अनुराग था, या वह हाड़-मांस की नहीं बनी थी? रात के एकांत में अपनी मायके में भउजाई के साथ सोई बसमतिया कहती है...

भउजी जबसे तुम्हारा घर से ननदोई भागा है तबसे जाने क्या हुआ कि मेरी देह भी उसके साथ चली गई है। समझ में नहीं आता कि देह कैसे चली गई, मेरी खुशियां लेकर, मुई देह भी गुसिया गई है मुझ परकृ 52

यानि एक तरह से पति-परित्यक्ता, युवा बसमतिया जिस तरह की परिस्थितियों का शिकार है, उसमें किसी भी तरह उसकी ज़िन्दगी निरापद नहीं है। वह जिस मालिक के काम पर जाती है, एक मौका पाकर वह उसे दबोच लेता है। संघर्ष करके बसमतिया उसके चंगुल से निकल भागती है, और दुबारा फिर उसके काम पर नहीं जाती। बसमतिया के जेठ की भी उस पर बुरी निगाह है। अव्वल तो वह चाहता है कि बसमतिया किसी के साथसलटकर दफा हो जाये तो जगदा के हिस्से की जरा सी जमीन उसे मिल जाये या फिर बसमतिया उसके अवैध संरक्षण में रहने लगे। लेकिन बसमतिया कठिन जिन्दगी जीते हुए भी टूटती नहीं। यथा संभव न्यूनतम जरूरतों और शर्तों पर जिन्दगी जीती है, लेकिन जेठ तथा मालिक जैसे बदनीयत लोगों के लिए वह सर्वथा अलभ्य बनी रहती है।

बसमतिया का पति भगोड़ा निकला जरूर लकिन बसमतिया परिस्थितियों के अंधड़ में सूखे पत्तों की तरह उड़ जाने वाली स्त्राी नहीं है। उसका जीवन रिक्त है और उसकी मनस्थिति को बड़ी बारीकी से उकेरने में लेखक ने पर्याप्त दक्षता का परिचय दिया है पर असल चीज है बसमतिया का जीवट, वह चट्टानी दृढ़ता, जो हर तरह के आर्थिक, मानसिक हरहराते अभावों के आगे पराभूत होना नहीं जानती। इसी ने बसमतिया के व्यक्तित्व को चमकदार बनाया है। लेकिन यहां यह कहना भी जरूरी है किहरियल की लकड़ीउपन्यास को स्त्राी विमर्श के खाते में डालकररिड्यूसनहीं किया जा सकता। दरअसल यह उपन्यास सीमांत की जिन्दगी जी रहे लोगों के संघर्ष और जिजीविशा की बिडंबनापूर्ण दास्तान तो है ही, साथ ही बचे-खुचे सामंती अवशेषो, पूंजीवाद के हमलावर चरित्रा और जनतंत्रा को अप्रासंगिक बनाने पर आमादा भष्ट, क्रूर प्रशासनिक व्यवस्था तथा विकास की इकहरी प्रक्रिया के दुःपरिणामों को उजागर करता एक खौलता कथा-दस्तावेज भी है।

बसमतिया उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा तो है लेकिन एक ऐसा पुल भी है जिस पर से होकर उसके मायके और ससुराल की ग्रामीण जिन्दगी की सीमांत चुनौतियां और संघर्ष अनेक रूपों में आवाजाही करते हैं। उसके बाप ने कभी सरकारी सहायता के तहत भैंस ली थी जिसके एवज में देय बैंक का कर्ज दो हजार से बढ़कर आठ हजार रुपये हो जाता है। यह कर्ज भी एक नेता की कागजी    धोखा-धड़ी की देन है जिसका शिकार उसका अनपढ़ बाप बनता है। बाप को जेल जाना पड़े और किसी तरह कर्ज से छुटकारा मिले इसके लिए गॉव के सीधे-सादे दूसरे कर्जदारों के साथ बसमतिया को बैंक और कचहरी का चक्कर लगाना पड़ता है। बसमतिया की गॉव की सहेली ननकी का दूर का एक रिष्तेदार देवनाथ डूबते को तिनके का सहारा जैसा वकील मिल जाता है और हालांकि बसमतिया का बाप जेल जाने से बच जाता है, उपभोक्ता फोरम के माध्यम से मुकदमा जीतने के कारण उसे कर्ज से मुक्ति भी मिल जाती है। फिर भी रोज कमाने खाने वालों के लिए बैंक-कचहरी का चक्कर अपने आप में कितना बड़ा संघर्ष है, यह वकील देवनाथ से बसमतिया की इस जिज्ञासा चिन्ता से समझा जा सकता है...

फैसला कब तक हो जाएगा वकील साहब! यहां आओ तो सत्तर अस्सी रुपया खरच हो जाता है, दो दिन का नुकसान अलग से। रोज कमाओ खाओ नहीं तो फांकापृ.159

प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लूटतंत्रा का शिकार होकर सरकारी अनुदान, सहायता और बैंक कर्ज आदि के जरिए सीमांत की जिन्दगियां जहां जाल में फंसकर छटपटाती हैं, वहीं औद्योगिकरण और इकहरे विकास की प्रवंचना भी उन्हीं के हिस्से आती है।

गॉव के आकाश का सूरज, गॉव के हिस्से की जमीन, धूप हवा, जंगल, पहाड़ सभी कुछ गॉव में होते हुए भी गॉव से बाहर थे उन पर दूसरों का कब्जा था। नदी का पानी दूर जाकर नहर में गिरता था जिससे गॉव का रिश्ता नहीं। गॉव का पहाड़ टूट-टूट कर ढोंका, पटिया, चूना, सीमेन्ट, अल्युमिनियम बनता था, जंगल कटकर पलंग, कुर्सी,मेज, किवाड़ वगैरह में ढलता था पर बसमतिया का मायकाकृबिना नहर वाला, बिना कुर्सी वाला, बिना सीमेन्ट वाला था जो आज भी है। इतिहास की बनती बिगड़ती स्थितियों ने कभी भी इस गॉव का भला नहीं कियापृ..73-74

उपन्यास का अंत सचमुच विचलित कर देने वाला है। गॉव के पंडितों के मन मुताबिक ग्रामसभा का काम होने के कारण वे भूमिहीनों और मजदूर तबके के लोगों का साथ देने वाले ग्रामप्रधान के खिलाफ हैं। अंततः गॉव के भूमिपति यानि पंडित वन विभाग के रंेजर के साथ मिलकर प्रधान भूमिहीन ग्रामीणों के खिलाफ साजिश रचते हैं। रेजर की अगुवाई में वन विभाग वाले जंगल की जमीन पर कब्जा का बहाना बना कर उनकी झोपड़ियां उजाड़ते हैं, आग लगा देते हैं, विरोध करने वालों को खदेड़कर पकड़ ले जाते हैं। रेंजर आफिस पर खुद लकड़ी के गोदाम में आग लगवाकर रेजर, गॉव वालों को आरोपी बनाता है। यह सारी कार्यवाई रात में होती है। बसमतिया और रज्जो के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। इस बर्बर दमनात्मक कार्यवाई के बाद प्रधान समेत पकड़े गये ग्रामीणों को गिरफ्तार कराके जेल भेज दिया जाता है। पक्ष विपक्ष में खबरे छपती हैं, चूंकि वकील देवनाथ भी ग्रामीणों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार होता है इसलिए वकीलों की हड़ताल और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के धरना प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक बार फिर मामला जॉच और कचहरी की पेचीदा गलियों में चला जाता है। विचलित कर देने वाले दमन और षडयंत्रा के गर्भ में जिस तरह के विस्फोट के मुहाने पर जाकर उपन्यास खत्म होता है, वहां हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और इसकी उपलब्धियों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह स्वयमेव खड़ा हो जाता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के गाए जा रहे भारतीय सोहर के सामने यह उपन्यास एक ऐसा शोकगीत है जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता।

परिचय (साहित्यिक पत्रिका----

अंक 06 पृ...107-110

हंस मासिक पत्रिका

समीक्ष्य कृति- हरियल की लकड़ी’ (उपन्यास)

प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन,

नेता जी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली, 110002

मूल्य-195.00 सन्- 2006     hhhhh

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मौलिक अधिकारों के संघर्ष की तैयारीतीसरा रास्ता

                                                                                   नन्द किशोर नीलम




एन.जी.. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो-आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ (बाउन्ड्री) का काम खेत की रखवाली करना होता है, पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन.जी.ओज की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यासतीसरा रास्तामें यही संशय उमड़ता-घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन.जी.. का कर्ताधर्ता डी.बी़ जैसा शातिर व्यक्ति, जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं, शोषक भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के, समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है,वह कहता है...

क्रान्ति एक छलावा है, तथा विकास यथार्थ  वह आगे कहता है...

बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली  पृ...21

इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बी. राजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है। उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई कोई स्त्राी हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती है, जो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धति, बाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्राी का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी.बी. की सहायक   मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्राी की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधा, अस्मिता, नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्राी पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्राी जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों (देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करना) पर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्राी पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है।

प्रस्तुत उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्य शोषितों, पीड़ितों, दलितों, दमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जल,जंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निश्क्रिय और उदासीन है, लगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी -विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन.जी.. इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें..

आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्रा की हत्या कर दी हैपृ...224

एन.जी.. वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं, आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं।समाज बदलने के व्यापक उद्दष्यों को छोड़करये एन.जी.. वाले गरीबी, भुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ...198

इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता है, दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी-छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जल, जंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जन सहभागिता से बनवाये जा रहे बंधी निर्माण से खुश नहीं है, उसके धन वर्चस्व का सारा खेल बड़े   बांध खड़े होने में है।

वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिस? नेता, और स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधा, विजयकीर्ति भाई, निखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाए? लेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक सत्तरवर्षीय वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा मेंकरमागा गा कर नाचने लगता है। पृ...222 यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डर, हताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने-मारने पर उतारू हैं।

इस उपन्यास का  शीर्षकतीसरा रास्तादेख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह  उपन्यासकार भी एकतीसरा रास्ताबनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सत्ता और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंाडतीसरा रास्तामें करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश भट्टाचार्य (डी.बी.) का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवाना, हत्या की राजनीति का पैरोकार होना, बाद में एन.जी.. चलाना और अपने भ्रश्ष्ट व्यभिचारी चरित्रा को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अबतीसरा विकल्पयातीसरा रास्ताबचा है? क्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है? क्या संघर्ष और प्रतिरोधी चेतना परधनऔरआध्यात्मने आधिपत्य कायम कर लिया है? क्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्रा फलीभूत हो चुका है? ऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास कीजयहै यापराजयतनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।

डी.बी. का सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन-दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियों, संघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वहीतीसरा रास्तातो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया है? बहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुएतीसरे रास्तेका घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े   अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म (?)ही हो सकता है, जहां तर्क चलता है कानून। यहां तमाम धार्मिक कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारें और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं।

इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव ऊभ-चूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता है, यही इस उपन्यास की सफलता है।

उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत होगा।कृ

हम साकारी विधानों, कानूनों, परंपराओं के तार्किक प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं, इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैंपृ...33

अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटो, खाना दो, पढ़़ाओ, दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैंपृ...35

डी.बी. को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई, क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था, उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायडपृ...39

तुम्हारा नाम प्रवीण है, तूं एन.जी.. चलाता है, तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ...64

वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है।पृ....106

सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सकेपृ..116

बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगाकृयदि लाभ, अतिरिक्त लाभ वाली व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्रा प्रबंधन से तोड़ दिया जाए, इससे नौकरषाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।

प्रतिरोध कार्यक्रम खुला-खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दान, प्रतिदान, बैंक कर्जों के आवंटन, दया कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकर, क्रय शक्ति बढ़ा कर, अवसरों में समानता का वातावरण बना कर, सामाजिक मर्यादा बहाल कर? उत्पादनों को जनोन्मुखी बना करपृ...193

आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैं, जमीन में कोयला, हीरा, सोना, चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ो, हमेशा उजड़ते रहो, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहीं, हमारा भी हक़ है इस माटी पर, इस जंगल पर, अब हम इसे कटने नहीं देंगे, जंगल का फल-फूल, बालू, मिट्टी सारा हमारा, हमें नहीं चाहिए दिल्लीपृ...224

यहां आकर इतिहास मरे मरे पर विज्ञान, राजनीति, दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्रा में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैंपृ...227

हंस कथा मासिकक-फरवरीक-2010 पृ...84-85

समीक्ष्य कृति-तीसरा रास्ता

पिलग्रिम्स प्रकाशन

बी.27/98--8, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी, 221010

मूल्य-225.00 फोन(91-542)2314060

                                     



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     विस्थापित होते समय का दस्तावेज

           ढूह वाली लछमिनिया

                                                                        अमरनाथ अजेय




यह दौर कठिन समय का है। इस समय में चुनौतियां चारो तरफ से हैं, कुछ खतरे बाहर से हैं तो कुछ भीतर से। जहां तक खतरों की बात है खासतौर से ये सोनभद्र जैसे आदिवासी बहुल जनपद में अन्य जनपदों की तुलना में कुछ ज्यादा ही हैं। लेकिन जो खतरे अपने लोगों से हैं वे कहीं अधिक त्रासद हैं, चिंतनीय है। आज के बाज़ारवादी समय का दबाव जंगल जंगल भूमि पर ज्यादा है, और ये दबाव बनाने वाले कोई और लोग नहीं हैं, बल्कि अपने हुक्मरान हैं, अपने अफसर हैं, अपने कानून हैं। जो जंगली मानुष अपनी जमीन और जंगल से विस्थापित हो रहा है उसके लिए खतरा केवल जमीन का ही नहीं है बल्कि संस्कृति और सम्मान का भी है, अस्तित्व बचाने का भी है। ऐसे दुरूह समय का दस्तावेज है रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यासढूह वाली लछमिनिया लछमिनिया समामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सांस्कृतिक खतरों से घिरे हुए एक आदिवासी परिवार की युवा लड़की है। लछमिनिया की चिंता में केवल अपनी देह ही नहीं है उसकी चिंताओं में भीखू काका की जमीन है, तो वह पीड़ित लडकी भी है जो जिला स्तर के एक अफसर द्वारा यौन शोषण की शिकार हुई है, तथा उसका गॉव भी है जिसे किसी किसी दिन विस्थापित किया जाना है। गॉव को विस्थापित किए जाने की नोटिस सरकार ने कथितरूप से तामिल करा दिया है। इन चिंताओं चुनौतियों के अलावा उसकी चिंताओं में गॉव की फसल है, गीत, संगीत तथा परंपराएं हैकरमानृत्य, संगीत मण्डली की सहभागिता को टूटने से बचाना भी है। इन चिंताओं की खातिर वह माथा पीट कर टूट जाने वाली किसी लड़की की तरह नहीं है बल्कि किसी बहादुर की तरह वह हर स्तर पर चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार भी है। चुनौतियों से टकराने की उसकी मानसिक तैयारी कुदरती है, इस तैयारी के लिए उसने कहीं से शिक्षण प्रशिक्षण नहीं लिया है। वह अब तक तमाम चरित्रों से अलग है जो स्वस्फूर्त चेतना का उत्पाद है। उसे पता है कि चुनौतियों से टकराने के लिए उसे क्या करना चाहिए। बाहर तथा भीतर से आए संक्रमणों से जिस तरह वह लड़ती है वह स्वतः उल्लेखनीय बन जाता है। संक्रमण की स्थितियां, परिस्थितियां कुदरती नहीं, बदलते समय के जड़ लोगों की कुटिल चालों, विभेदी कानूनी फन्दों, लुभावने वादों के जरिए आती हैं। समय तो बदला है लेकिन उसके साथ खतरे भी बदल गये हैं। खतरों नेे भी अपना रूप जिले के पीड़ित लड़की का यौन शोषणकरने वाले अधिकारी (उपन्यास का एक पात्रा) की तरह बदल लिया है। यह वही अधिकारी है जो एक दिन लछमिनिया को दबोच लेता है, उसे क्या पता कि लछमिनिया जो एक आदिवासी युवती है वह समय से टकराने के कौशल में माहिर है, वह अपना बचाव विषम स्थितियों में भी कर सकती है। ऐसा ही हुआकृअपने बचाव में लछमिनिया हंसुआ वाली लड़की बन जाती है। खतरों के बारे में किसे पता कि वे अफसर की कुटिल चालों के रूप में आयेंगे, या किस प्रकार आयेंगे? खतरा गया अफसर के रूप मेंकृअफसर को तो करमा मंडली का चुनाव करना था। सो उक्त अधिकारी लछमिनिया के गॉव गया हुआ था, करमा नाचने गानेवाले तो आदिवासियों के गॉव में ही मिलते। गॉव में करमा नृत्य का प्रदर्शनहुआ, नृत्य के प्रदर्शन ने अफसर की निगाह में लछमिनिया के रूप को कामुक बना दिया फिर क्या था, अफसर तो अफसर कृत्रिम बहानों के जरिए वह टूट पड़ा लछमिनिया पर और लछमिनिया ने बचाव में हंसुआ उठा लिया। इसके पहले कि लछमिनिया अफसर पर हंसुआ चला देती, अफसर अपने वर्गीय चरित्रा के अनुरूप गिड़गिड़ाने लगा। लछमिनिया ने कुदरती उदारता के कारण अफसर को जीवित छोड़ दिया, उस पर हंसुआ नहीं चलाया। अफसर के गिड़गिड़ाने माफी मांगने को उसने कुदरती समझा, ‘गलतियां हो जाती हैं किसी की जान लेना ठीक नहीं। 

खतरों का क्या, दिन हो रात हो, जगह कोई हो, दहाड़ते हुए जाते हैं। वह भी ऐसे समय मंे जब दुनिया पूंजी के नाच में मगन हो, जहां कदम कदम पर आशंकायें खतरे ही हों। खतरे तो ऐसे हैं जो गॉव के बड़े जोतदार तथा थाने के दुलरुआ शंकर गवहां की तरफ से भी लछमिनिया के सामने आये। वह उन खतरों से तो लड़ ही रही थी कि एक दिन पूंजीवादी चरित्रा का एक और खतरा उसके बपई की तरफ से गया जिसमें वह बुरी तरह से उलझ गई।

अब क्या होगा? कैसे लड़ेगी वह बपई से? बपई ने तो एक ठीकेदार से उसे बेचने का राजीनामा कर लिया है। जैसे वह कोई सामान हो, धान, चावल, गेहूं, गाय गोरू की तरह। वह बिक जायेगी पर उसके बपई को नहीं मालूम कि लछमिनिया बिकने वाली सामान या कोई कमोडिटी नहीं है, जिसे बेच दिया जाये। वह उस खतरे से भी लड़ती है और सफल होती है। ठीकेदार की कार दिन दहाड़े जला दी जाती है, लछमिनिया का बपई भी उस दिन गॉव में होता तो मारा जाता, गॉव की स्वस्फूर्त उत्तेजना में उसकी जान चली जाती, ठीकेदार जान बचाकर भागा नहीं तो जाने क्या होता, ठीकेदार की अकूत संपदा उसे जीवन दान तो नहीं दे सकती थी। सो अगर वह गॉव से भागा होता तो मारा जाता। लछमिनिया को क्या पता कि उसका बपई भी उसके लिए खतरा बन जायेगा और उसका सौदा ठीकेदार से कर लेगा। लछमिनिया का बपई हालांकि था तो आदिवासी ही जो सामान्यतया बाजारू नहीं हुआ करते पर वह ठीकेदार के प्रलोभन में बाजारू बन गया और अपनी बिटिया का ही बेचने के लिए राजीनामा कर लिया। उसे ठीकेदार ने सपना दिखाया था कि उसे वह अपने क्रशर का पार्टनर बना देगा जहां वह मजूरी करता था। पार्टनर बन जाने की लालच ने लछमिनिया के बपई को बाजरू बना दिया और उसने अपनी बिटिया को बेच देने का राजीनामा ठेकेदार से कर लिया। तो खतरे ऐसे होते हैं, खतरे मॉ, बाप, भाई, बहन, बहनोई, मामा किसी के भी जरिए सकते हैं। बपई की तरफ का खतरा लछमिनिया के लिए पूंजी के खेल वाला था, कौन है जो धन दौलत वाला नहीं बनना चाहता। पर लछमिनिया तो स्थितिप्रज्ञ होकर बपई की कुटिल योजना से टकराती है। ठीकेदार भाग जाता है, उसकी कार जला दी जाती है। लछमिनिया के गॉव के लिए ही नहीं थाने के लिए भी यह घटना करवट बदल लेती है। थानेदार ठीकेदार आदि तो वैसे भी पूंजीतंत्रा के रिश्तों में बंधे होते हैं। स्थानीय थाने का दारोगा जो पदेन अर्थपिपाशु था उसे ठीकेदार की पूंजी ने मोह लिया फिर तो दारोगा ने ठीकेदार की कार जलाने और गॉव में झगड़ा फसाद करने के जुर्म में गॉव के कुछ अन्य युवाओं के साथ लछमिमिया के पति को गिरफ्तार कर लिया। लछमिनिया जानती थी कि दारोगा कि यही सीमा है, उसके पति को गिरफ्तार करने के अलावा वह कर भी क्या सकता है पर दारोगा को नहीं पता कि लछमिनिया का गॉव का जन मन क्या कर सकता है?

लछमिनिया उसके पति को को पूरा गॉव भली भांति जानता है। गॉव के लड़के उन दोनों के लिए मर मिटने के लिए तैयार रहते हैं। लड़कों को बुरा लगा कि लछमिनिया के बपई ने लछमिनिया को बेचने का ठीकेदार से राजीनामा कर लिया है सो गॉव के नौजवान लड़कों ने गुस्से में आकर स्वस्फूर्त ढंग से ठीकेदार की कार जला दिया और उसी दिन थाना भी घेर लिया। उन्हें नहीं पता था कि थाना घेरना अन्याय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है या और कुछ। दारोगा थाना घिरा देख कर सहम गया उसके पास घेराव का दमन करने के तरीके नहीं थे, वह मजबूर था, उसी दिन अदालत ने लछमिनिया के पति की गिरफ्तारी के बारे में थाने से रिपोर्ट भी मॉग लिया था। लक्षमिनिया के पति की मॉ से जंगल विभाग के रेंजर की करीबी पहचान थी। रेंजर कानूनी दॉव पेंचों के अनुसार लछमिनिया के पति को गिरफ्तार होते ही अदालत चला गया था। अदालत ने थाने से रिपोर्ट मॉग लिया था। गॉव से गवाह भी नहीं मिलते। सो थानेदार ने लछमिनिया के पति को थाने से ही छोड़ दिया, कौन बवाल में पड़े, अदालत किसी को नहीं छोड़ती। तो यही कहानी हैढूह वाली लछमिनियाउपन्यास की। इस कहानी में लछमिनियिा की जिन्दगी से जुड़ी चुनौतियां है तो गॉव जवार से जुड़ी चुनौतियां भी हैं। लछमिनिया जंगली गॉव की रहने वाली है जंगल के गॉव यानि कई बार के विस्थापन के शिकार गॉव। लछमिनिया का गॉव भी कई बार के विस्थापन के बाद बसा है पर उसे हाल ही में उजाड़ा जाना है, नोटिसें दी जा चुकी हैं। उपन्यास इसी आखिरी बार के विस्थापन के लिए दी जा चुकी नोटिस एवं विस्थापन कार्यवाहियों के व्यापक विरोध के स्तर पर समाप्त हो जाता है।

होता यह है कि जिस कंपनी को लछमिनिया के गॉव की जमीन सरकार द्वारा आवंटित किया गया है उक्त कंपनी आवंटित जमीन पर कब्जा लेना चाहती है दूसरी तरफ गॉव वाले हैं कि वे किसी भी हाल में उजड़ना नहीं चाहते सो वे प्रतिकार में उठ खड़े होते हैं। जैसा कि मालूम है कि सरकार और प्रष्शासन तो एक रेखीय दमनात्मक सत्ता प्रबंधन पर पुलिस बल के सहयोग से चलने का अभ्यासी हुआ करती है सो वहां पुलिस बल दमन पर उतर जाता हैकृफिर वही हजारों साल की पुलिस परंपरा, मारपीट, यातना, दमन और गिरफ्तारियां। गॉव के नौजवानों के साथ गॉव की कुदरती नेत्राी लक्षमिनिया को गिरफ्तार कर लिया जाता है, वह पाथरटोला वालों के साथ जेल चली जाती हैकृफिर भी वह निश्चिंत है.

का फरक है जेहल अउर ईहां में? ईहां से तो जेलवय ठीक है, मार का डर, चोरी चमारी का डर, खाओ अउर सूतो।

लछमिनिया पाथर टोला गॉव के सर्वतोमुखी विकास के लिए एक नायिका की भूमिका निभाती है जो भीखू काका की जमीन में बोई धान की फसल को दबंग शंकर गवहां उनके पुत्रों को ले जाने से रोकवा देती है। गॉव में होने वाली अर्थहीन रैलियों का प्रतिरोध करती है और प्रतिशोध में फसाये गये अपने प्रेमी/पति को थाने का घेराव करके छुड़वा लेती है। इतना ही नहीं वह खुद को भी अपने बाप के साजिशों से बचा ले जाती है। इतना ही नहीं वह अपने गॉव के विस्थापन के प्रतिरोध में गॉव वालों के साथ जेल जाती है।

उपन्यास में आये शब्द चित्रों को देखें...

चरित्तर लड़कियों को जानता है, यदि मजबूरी हो तो वे किसी को भी सभ्य बनाकर ऐसा संस्कारित कर दें कि वे जीवन भर नाम लें कि लड़कियां ऐसी होती हैं जिनकी देह पर बाजार का अर्थ लिखा जा सकता है।

आखिर बाजार ने किसे नहीं छला है? अपसंस्कृति भी तो बाजार का ही एक खेल है। आज के जटिल समय में जंगल का आदिवासी विकास की धारा से कोसों दूर है। उनमें जनतांत्रिक प्रतिरोध की क्षमता का भी विकास नहीं हो पाया है। सोनभद्र जिले के आदिवासियों के विस्थापन पर केन्द्रित प्रस्तुत उपन्यासढूहवाली लछमिनियागिरिवासियों के दुख दर्द का कालजयी दस्तावेज हैै। अपनी भाषा में उपन्यास के पात्रा अपनी स्थितियों, परिस्थितियों का एहसास कराते हैं जिससे संवाद जीवंत हो जाता है। उपन्यास की भाषिक जीवंतता उल्लेखनीय है। अपेक्षा है कि प्रस्तुत उपन्यास पाठकांे का घ्यान आकर्षित करने में सफल होगा।आइए उपन्यास में आये कुछ संवादों, प्रतिसंवादों को देखें....

पर शंकर यादव अपने घर लौटने के बाद अपने में डूब गया। ज़माना बदल गया है, जंगल जाग रहा है पहले वाला नहीं कि सोया हुआ था। सरकारें भी अब पहले वाली नहीं हैं, गरीब गुरबों की सरकार प्रदेश में काबिज है, गरीबों की सुरक्षा के बाबत कानून बन गये हैं। थाना हो या कचहरी अब कहीं भी गॉधी टोपी वाले नहीं दिखते, ठाकुर, बाभन जैसे ज़मीनदार अपनी गुफाओं में बैठे हैं, करंे भी तो क्या?’ पृ...20

चुप रह छोटकू, तूं बड़बड़ करता रहता है, तूं का जानेगा कायदा, कानून, अब तो पुलिस पेड़ों अउर झाड़ियों पर भी मुकदमा कर देती है।पृ...21 ‘समझेगा का? यही कि चिड़िया जाल में, जाल खींचो अउर पकड़ लो।पृ..38

का खाली, का भरा, खाली ही ठीक है, पहिले मॉग भरो फिर पेट, आया था एक लंगूरपृ..47 ‘देख महटर, हम तोहरे पर इलजाम नाहीं लगा रहे, खाली हम अपने को बचाय रहे हैं,नाहीं बचायेंगे तोकृमन तो भर जायेगा जो खाली खाली है, पर मनवै तो नाहीं भरेगा नऽ, पेटवो तऽ भर जायेगा।पृ...51 ‘लछमिनिया ऐसी नदी नहीं जिसे बांधा जा सके या पुल ही बनाया जा सके।पृ...57 ‘गॉव में जबसे चिमनियां घुसी हैं, जाने कितने किसिम के धुंआ भी घुसे हैं।पृ...61 ‘संघरस तो मरदों का काम है, एमें जनाना का करेंगी? पृ...81 ‘वैसे गॉवों में कागजों की पहुंच बहुत कम होती है, और कानून तो कागजों पर ही उछलता कूदता है।पृ...87‘टोले मंे जनतंत्रा की आग धधक रही थी।पृ..90 ‘उस दौर के अधिकारी भी खूब थे, कानून की सजी संवरी जीभ वाले, पुलिस के पास तो बारूदी जुबान थी ही।पृ...92 ‘बाल, बुतरू भी नौकरों से जनमवाते हैं का अइया?’ पृ..93

इस सभ्यता ने तो यही सिखाया है कि हर चीज बेचे जाने योग्य है।पृ...101 ‘अरे! मरदवा तऽ सभै हरामी होते हैं।पृ..127 ‘लछमिनिया तूं घूंघट काढ़कर घर में बैठी है, निकल बाहर, हल्ला कर, चिल्ला जोर जोर से, कोई तो सुनेगा, कोई तो चलेगा तेरे साथपृ...136 ‘भगाई को राजीनामा बोलता है, एके कानून बचायेगा, जा कानून के संगे खा, पी, अउर हग, मूत, रहेगा कहां रे! पृ...139

समीक्ष्य कृति--‘ढूह वाली लछमिनिया

रचनाकार- रामनाथ शिवेन्द्र

पाठ- जुलाईक--2017

ज्योतिपर्व मीडिया एण्ड पब्लिकेशन

99, ज्ञानखण्ड-3, इन्दिरा पुरम्

गजियाबाद-201012 मूल्य--299.00                                    


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